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Wednesday, November 28, 2018

विज्ञान भैरव तंत्र | तंत्र-सूत्र–विधि

Unknown
विज्ञान भैरव तंत्र | तंत्र-सूत्र–विधि
शिव कहते है:हे देवी, यह अनुभव दो श्‍वासों के बीच घटित हो सकता है।
श्‍वास के भीतर आने के पश्‍चात और बाहर लौटने के ठीक पूर्व–
श्रेयस् है, कल्‍याण है।

आरंभ की नौ विधियां श्‍वास-क्रिया से संबंध रखती है। इसलिए पहले हम श्‍वास-क्रिया के संबंध में थोड़ा समझ लें और विधियों में प्रवेश करेंगे।
हम जन्‍म से मृत्‍यु के क्षण तक निरंतर श्‍वास लेते रहते है। इन दो बिंदुओं के बीच सब कुछ बदल जाता है। सब चीज बदल जाती है। कुछ भी बदले बिना नहीं रहता। लेकिन जन्‍म और मृत्‍यु के बीच श्‍वास क्रिया अचल रहती है। बच्‍चा जवान होगा, जवान बूढ़ा होगा। वह। बीमार होगा। उसका शरीर रूग्‍ण और कुरूप होगा। सब कुछ बदल जायेगा। वह सुखी होगा, दुःखी होगा, पीड़ा में होगा, सब कुछ बदलता रहेगा। लेकिन इन दो बिंदुओं के बीच आदमी श्‍वास भर सतत लेता रहेगा।
श्‍वास क्रिया एक सतत प्रवाह है, उसमें अंतराल संभव नहीं है। अगर तुम एक क्षण के लिए भी श्‍वास लेना भूल जाओं तो तुम समाप्‍त हो जाओगे। यही कारण है कि श्‍वास लेने का जिम्‍मा तुम्‍हारी नहीं है। नहीं तो मुश्‍किल हो जायेगी। कोई भूल जाये श्‍वास लेना तो फिर कुछ भी नहीं किया जा सकता।

विज्ञान भैरव तंत्र | तंत्र-सूत्र–विधि


इसलिए यथार्थ में तुम श्‍वास नहीं लेते हो, क्‍योंकि उसमे तुम्‍हारी जरूरत नहीं है। तुम गहरी नींद में हो और श्‍वास चलती रहती है। तुम गहरी मूर्च्‍छा में हो और श्‍वास चलती रहती है। श्‍वासन तुम्‍हारे व्‍यक्‍तित्‍व का एक अचल तत्‍व है।
दूसरी बात यह जीवन के अत्‍यंत आवश्‍यक और आधारभूत है। इस लिए जीवन और श्‍वास पर्यायवाची हो गये। इस लिए भारत में उसे प्राण कहते है। श्‍वास और जीवन को हमने एक शब्‍द दिया। प्राण का अर्थ है, जीवन शक्‍ति, जीवंतता। तुम्‍हारा जीवन तुम्‍हारी श्‍वास है।
तीसरी बात श्‍वास तुम्‍हारे और तुम्‍हारे शरीर के बीच एक सेतु है। सतत श्‍वास तुम्‍हें तुम्‍हारे शरीर से जोड़ रही है। संबंधित कर रही है। और श्‍वास ने सिर्फ तुम्‍हारे और तुम्‍हारे शरीर के बीच सेतु है, वह तुम्‍हारे और विश्‍व के बीच भी सेतु है। तुम्‍हारा शरीर विश्‍व का अंग है। शरीर की हरेक चीज, हरेक कण, हरेक कोश विश्‍व का अंश है। यह विश्‍व के साथ निकटतम संबंध है। और श्‍वास सेतु है। और अगर सेतु टूट जाये तो तुम शरीर में नहीं रह सकते। तुम किसी अज्ञात आयाम में चले जाओगे। इस लिए श्‍वास तुम्‍हारे और देश काल के बीच सेतु हो जाती है।
श्‍वास के दो बिंदु है, दो छोर है। एक छोर है जहां वह शरीर और विश्‍व को छूती है। और दूसरा वह छोर है जहां वह विश्‍वातीत को छूती है। और हम श्‍वास के एक ही हिस्‍से से परिचित है। जब वह विश्‍व में, शरीर में गति करती है। लेकिन वह सदा ही शरीर से अशरीर में गति करती है। अगर तुम दूसरे बिंदू को, जो सेतु है, धुव्र है, जान जाओं। तुम एकाएक रूपांतरित होकर एक दूसरे ही आयाम में प्रवेश कर जाओगे।
लेकिन याद रखो, शिव जो कहते है वह योग नहीं है। वह तंत्र है। योग भी श्‍वास पर काम करता है। लेकिन योग और तंत्र के काम में बुनियादी फर्क है। योग श्‍वास-क्रिया को व्‍यवस्‍थित करने की चेष्‍टा करता है। अगर तुम अपनी श्‍वास को व्‍यवस्‍था दो तो तुम्‍हारा स्‍वास्‍थ सुधर जायेगा। इसके रहस्‍यों को समझो, तो तुम्‍हें स्‍वास्‍थ और दीर्घ जीवन मिलेगा। तुम ज्‍यादा बलि, ज्‍यादा ओजस्‍वी, ज्‍यादा जीवंत, ज्‍यादा ताजा हो जाओगे।
लेकिन तंत्र का इससे कुछ लेना देना नहीं है। तंत्र स्‍वास की व्‍यवस्‍था की चिंता नहीं करता। भीतर की और मुड़ने के लिए वह श्‍वास क्रिया का उपयोग भर करता है। तंत्र में साधक को किसी विशेष ढंग की श्‍वास का अभ्‍यास नहीं करना चाहिए। कोई विशेष प्राणायाम नहीं साधना है, प्राण को लयवद्ध नहीं बनाना है; बस उसके कुछ विशेष बिंदुओं के प्रति बोधपूर्ण होना है।
श्‍वास प्रश्‍वास के कुछ बिंदु है जिन्‍हें हम नहीं जानते। हम सदा श्‍वास लेते है। श्‍वास के साथ जन्‍मते है, श्‍वास के साथ मरते है। लेकिन उसके कुछ महत्‍व पूर्ण बिंदुओं को बोध नहीं है। और यह हैरानी की बात है। मनुष्‍य अंतरिक्ष की गहराइयों में उतर रहा है, खोज रहा है, वह चाँद पर पहुंच गया है। लेकिन वह अपने जीवन के इस निकटतम विंदु को समझ नहीं सका। श्‍वास के कुछ बिंदु है, जिसे तुमने कभी देखा नहीं है। वे बिंदु द्वार है, तुम्‍हारे निकटतम द्वार है, जिनसे होकर तुम एक दूसरे ही संसार में, एक दूसरे ही अस्‍तित्‍व में, एक दूसरी ही चेतना में प्रवेश कर सकते हो।
लेकिन वह बिंदु बहुत सूक्ष्‍म है। जो चीज जितनी निकट हो उतनी ही कठिन मालूम पड़ेगी, श्वास तुम्‍हारे इतना करीब है, कि उसके बीच स्‍थान ही नहीं बना रहता। या इतना अल्‍प स्‍थान है कि उसे देखने के लिए बहुत सूक्ष्‍म दृष्‍टि चाहिए। तभी तुम उन बिंदुओं के प्रति बोध पूर्ण हो सकते हो। ये बिंदु इन विधियों के आधार है।
शिव उत्‍तर में कहते है—हे देवी, यह अनुभव दो श्‍वासों के बीच घटित हो सकता है। श्‍वास के भीतर आने के पश्‍चात और बाहर लौटने के ठीक पूर्व—श्रेयस् है, कल्‍याण है।
यह विधि है: हे देवी, यह अनुभव दो श्‍वासों के बीच घटित हो सकता है। जब श्‍वास भीतर अथवा नीचे को आती है उसके बाद फिर श्‍वास के लौटने के ठीक पूर्व—श्रेयस् है। इन दो बिंदुओं के बीच होश पुर्ण होने से घटना घटती है।
जब तुम्‍हारी श्‍वास भीतर आये तो उसका निरीक्षण करो। उसके फिर बाहर या ऊपर के लिए मुड़ने के पहले एक क्षण के लिए, या क्षण के हज़ारवें भाग के लिए श्‍वास बंद हो जाती है। श्‍वास भीतर आती है, और वहां एक बिंदु है जहां वह ठहर जाती है। फिर श्‍वास बाहर जाती है। और जब श्‍वास बाहर जाती है। तो वहां एक बिंदु पर ठहर जाती है। और फिर वह भीतर के लौटती है।
श्‍वास के भीतर या बाहर के लिए मुड़ने के पहले एक क्षण है जब तुम श्‍वास नहीं लेते हो। उसी क्षण में घटना घटनी संभव है। क्‍योंकि जब तुम श्‍वास नहीं लेते हो तो तुम संसार में नहीं होते हो। समझ लो कि जब तुम श्‍वास नहीं लेते हो तब तुम मृत हो; तुम तो हो, लेकिन मृत। लेकिन यह क्षण इतना छोटा है कि तुम उसे कभी देख नहीं पाते।
तंत्र के लिए प्रत्‍येक बहिर्गामी श्‍वास मृत्‍यु है और प्रत्‍येक नई स्‍वास पुनर्जन्‍म है। भीतर आने वाली श्‍वास पुनर्जन्‍म है; बाहर जाने वाली श्‍वास मृत्‍यु है। बाहर जाने वाली श्‍वास मृत्‍यु का पर्याय है; अंदर जाने वाली श्‍वास जीवन का। इसलिए प्रत्‍येक श्‍वास के साथ तुम मरते हो और प्रत्‍येक श्‍वास के साथ तुम जन्‍म लेते हो। दोनों के बीच का अंतराल बहुत क्षणिक है, लेकिन पैनी दृष्‍टि, शुद्ध निरीक्षण और अवधान से उसे अनुभव किया जा सकता है। और यदि तुम उस अंतराल को अनुभव कर सको तो शिव कहते है कि श्रेयस् उपलब्‍ध है। तब और किसी चीज की जरूरत नहीं है। तब तुम आप्‍तकाम हो गए। तुमने जान लिया; घटना घट गई।
श्‍वास को प्रशिक्षित नहीं करना। वह जैसी है उसे वैसी ही बनी रहने देना। फिर इतनी सरल विधि क्‍यों? सत्‍य को जानने को ऐसी सरल विधि? सत्‍य को जानना उसको जानना है। जिसका न जन्‍म है न मरण। तुम बहार जाती श्‍वास को जान सकते हो, तुम भीतर जाती श्‍वास को जान सकते हो। लेकिन तुम दोनों के अंतराल को कभी नहीं जानते।
प्रयोग करो और तुम उस बिंदु को पा लोगे। उसे अवश्‍य पा सकते हो। वह है। तुम्‍हें या तुम्‍हारी संरचना में कुछ जोड़ना नहीं है। वह है ही। सब कुछ है; सिर्फ बोध नहीं है। कैसे प्रयोग करो? पहले भीतर आने वाली श्‍वास के प्रति होश पूर्ण बनो। उसे देखो। सब कुछ भूल जाओ और आने वाली श्‍वास को, उसके यात्रा पथ को देखो। जब श्‍वास नासापुटों को स्‍पर्श करे तो उसको महसूस करो। श्‍वास को गति करने दो और पूरी सजगता से उसके साथ यात्रा करो। श्‍वास के साथ ठीक कदम से कदम मिलाकर नीचे उतरो; न आगे जाओ और ने पीछे पड़ो। उसका साथ न छूटे; बिलकुल साथ-साथ चलो।
स्‍मरण रहे, न आगे जाना है और न छाया की तरह पीछे चलना है। समांतर चलो। युगपत। श्‍वास और सजगता को एक हो जाने दो। श्‍वास नीचे जाती है तो तुम भी नीचे जाओं; और तभी उस बिंदु को पा सकते हो, जो दो श्‍वासों के बीच में है। यह आसान नहीं है। श्‍वास के साथ अंदर जाओ; श्‍वास के साथ बाहर आओ।
बुद्ध ने इसी विधि का प्रयोग विशेष रूप से किया; इसलिए यह बौद्ध विधि बन गई। बौद्ध शब्‍दावली में इसे अनापानसति योग कहते है। और स्‍वयं बुद्ध की आत्‍मोपलब्‍धि इस विधि पर ही आधारित थी। संसार के सभी धर्म, संसार के सभी द्रष्‍टा किसी न किसी विधि के जरिए मंजिल पर पहुंचे है। और वह सब विधियां इन एक सौ बारह विधियों में सम्‍मिलित है। यह पहली विधि बौद्ध विधि है। दुनिया इसे बौद्ध विधि के रूप में जानती है। क्‍योंकि बुद्ध इसके द्वारा ही निर्वाण को उपलब्‍ध हुए थे।
बुद्ध न कहा है। अपनी श्‍वास-प्रश्‍वास के प्रति सजग रहो। अंदर जाती, बहार आती, श्‍वास के प्रति होश पूर्ण हो जाओ। बुद्ध अंतराल की चर्चा नहीं करते। क्‍योंकि उसकी जरूरत ही नहीं है। बुद्ध ने सोचा और समझा कि अगर तुम अंतराल की, दो श्‍वासों के बीच के विराम की फिक्र करने लगे, तो उससे तुम्‍हारी सजगता खंडित होगी। इसलिए उन्‍होंने सिर्फ यह कहा कि होश रखो, जब श्‍वास भीतर आए तो तुम भी उसके साथ भीतर जाओ और जब श्‍वास बहार आये तो तुम उसके साथ बहार आओ। विधि के दूसरे हिस्‍से के संबंध में बुद्ध कुछ नहीं कहते।
इसका कारण है। कारण यह है कि बुद्ध बहुत साधारण लोगों से, सीधे-सादे लोगों से बोल रहे थे। वे उनसे अंतराल की बात करते तो उससे लोगों में अंतराल को पाने की एक अलग कामना निर्मित हो जाती। और यह अंतराल को पाने की कामना बोध में बाधा बन जाती। क्‍योंकि अगर तुम अंतराल को पाना चाहते हो तो तुम आगे बढ़ जाओगे; श्‍वास भीतर आती रहेगी। और तुम उसके आगे निकल जाओगे। क्‍योंकि तुम्‍हारी दृष्‍टि अंतराल पर है जो भविष्‍य में है। बुद्ध कभी इसकी चर्चा नहीं करते; इसीलिए बुद्ध की विधि आधी है।
लेकिन दूसरा हिस्‍सा अपने आप ही चला आता है। अगर तुम श्‍वास के प्रति सजगता का, बोध का अभ्‍यास करते गए तो एक दिन अनजाने ही तुम अंतराल को पा जाओगे। क्‍योंकि जैसे-जैसे तुम्‍हारा बोध तीव्र, गहरा और सघन होगा, जैसे-जैसे तुम्‍हारा बोध स्‍पष्‍ट आकार लेगा। जब सारा संसार भूल जाएगा। बस श्‍वास का आना जाना ही एकमात्र बोध रह जाएगा—तब अचानक तुम उस अंतराल को अनुभव करोगे। जिसमें श्‍वास नहीं है।
अगर तुम सूक्ष्‍मता से श्‍वास-प्रश्‍वास के साथ यात्रा कर रहे हो तो उस स्‍थिति के प्रति अबोध कैसे रह सकते हो। जहां स्‍वास नहीं है। वह क्षण आ ही जाएगा जब तुम महसूस करोगे। कि अब श्‍वास न जाती है, न आती है। श्‍वास क्रिया बिलकुल ठहर गई है। और उसी ठहराव में श्रेयस् का वास है।
यह एक विधि लाखों-करोड़ों लोगों के लिए पर्याप्‍त है। सदियों तक समूचा एशिया इस एक विधि के साथ जीया और उसका प्रयोग करता रहा। तिब्‍बत, चीन, जापन, बर्मा, श्‍याम, श्रीलंका। भारत को छोड़कर समस्‍त एशिया सदियों तक इस एक विधि का उपयोग करता रहा। और इस एक विधि के द्वारा हजारों-हजारों व्‍यक्‍ति ज्ञान को उपलब्‍ध हुए। और यह पहली ही विधि है। दुर्भाग्‍य की बात कि चूंकि यह विधि बुद्ध के नाम से संबंद्ध हो गई। इसलिए हिंदू इस विधि से बचने की चेष्‍टा में लगे रहे। क्‍योंकि यह बौद्ध विधि की तरह बहुत प्रसिद्ध हुई। हिंदू इसे बिलकुल भूल गये। इतना ही नहीं, उन्‍होंने और एक कारण से इसकी अवहेलना की। क्‍योंकि शिव ने सबसे पहले इस विधि का उल्‍लेख किया, अनेक बौद्धों ने इस विज्ञान भैरव तंत्र के बौद्ध ग्रंथ होने का दावा किया। वे इसे हिंदू ग्रंथ नहीं मानते।
यह न हिंदू है और न बौद्ध, और विधि मात्र विधि है। बुद्ध ने इसका उपयोग किया, लेकिन यह उपयोग के लिए मौजूद ही थी। और इस विधि के चलते बुद्ध-बुद्ध हुए। विधि तो बुद्ध से भी पहले थी। वह मौजूद ही थी। इसको प्रयोग में लाओ। यह सरलतम विधियों में से है—अन्‍य विधियों की तुलना में। मैं यह नहीं कहता कि यह विधि तुम्‍हारे लिए सरल है। अन्‍य विधियां अधिक कठिन होंगी। यही कारण है कि पहली विधि की तरह इसका उल्‍लेख हुआ है।
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By Unknown at November 28, 2018 No comments:
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कर्म काम ना आयगा जो नियति है वो हो जायेगा | Karma vs Destiny

Unknown
कर्म काम ना आयगा जो नियति है वो हो जायेगा | Karma vs Destiny
नियति खुद ही बलवान है जब भी आप दखल दोगे तो वो गलत निर्णय ही होगा,देखते जाओ और हंसते रहो:-:-:; मृत्यु के देवता ने अपने एक दूत को भेजा पृथ्वी पर। एक स्त्री मर गयी थी, उसकी आत्मा को लाना था।
देवदूत आया, लेकिन चिंता में पड़ गया। क्योंकि तीन छोटी-छोटी लड़कियां जुड़वां–एक अभी भी उस मृत स्त्री से लगी है। एक चीख रही है, पुकार रही है। एक रोते-रोते सो गयी है, उसके आंसू उसकी आंखों के पास सूख गए हैं–तीन छोटी जुड़वां बच्चियां और स्त्री मर गयी है, और कोई देखने वाला नहीं है। पति पहले मर चुका है। परिवार में और कोई भी नहीं है। इन तीन छोटी बच्चियों का क्या होगा?
उस देवदूत को यह खयाल आ गया, तो वह खाली हाथ वापस लौट गया। उसने जा कर अपने प्रधान को कहा कि मैं न ला सका, मुझे क्षमा करें, लेकिन आपको स्थिति का पता ही नहीं है। तीन जुड़वां बच्चियां हैं– छोटी-छोटी, दूध पीती। एक अभी भी मृत से लगी है, एक रोते-रोते सो गयी है, दूसरी अभी चीख-पुकार रही है। हृदय मेरा ला न सका। क्या यह नहीं हो सकता कि इस स्त्री को कुछ दिन और जीवन के दे दिए जाएं? कम से कम लड़कियां थोड़ी बड़ी हो जाएं। और कोई देखने वाला नहीं है।
मृत्यु के देवता ने कहा, तो तू फिर समझदार हो गया; उससे ज्यादा,..... जिसकी मर्जी से मौत होती है, .......जिसकी मर्जी से जीवन होता है!



तो तूने पहला पाप कर दिया, और इसकी तुझे सजा मिलेगी। और सजा यह है कि तुझे पृथ्वी पर चले जाना पड़ेगा। और जब तक तू तीन बार न हंस लेगा अपनी मूर्खता पर, तब तक वापस न आ सकेगा।
इसे थोड़ा समझना। तीन बार न हंस लेगा अपनी मूर्खता पर–क्योंकि दूसरे की मूर्खता पर तो अहंकार हंसता है। जब तुम अपनी मूर्खता पर हंसते हो तब अहंकार टूटता है।
देवदूत को लगा नहीं। वह राजी हो गया दंड भोगने को, लेकिन फिर भी उसे लगा कि सही तो मैं ही हूं। और हंसने का मौका कैसे आएगा?
उसे रूस की जमीन पर फेंक दिया गया।
एक चमार, सर्दियों के दिन करीब आ रहे थे और बच्चों के लिए कोट और कंबल खरीदने शहर गया था, कुछ रुपए इकट्ठे कर के। जब वह शहर जा रहा था तो उसने राह के किनारे एक नंगे आदमी को पड़े हुए, ठिठुरते हुए देखा।
यह नंगा आदमी वही देवदूत है जो पृथ्वी पर फेंक दिया गया था।
उस चमार को दया आ गयी। और बजाय अपने बच्चों के लिए कपड़े खरीदने के, उसने इस आदमी के लिए कंबल और कपड़े खरीद लिए।
इस आदमी को कुछ खाने- पीने को भी न था, घर भी न था, छप्पर भी न था जहां रुक सके। तो चमार ने कहा कि अब तुम मेरे साथ ही आ जाओ। लेकिन अगर मेरी पत्नी नाराज हो–जो कि वह निश्चित होगी, क्योंकि बच्चों के लिए कपड़े खरीदने लाया था, वह पैसे तो खर्च हो गए–वह अगर नाराज हो, चिल्लाए, तो तुम परेशान मत होना। थोड़े दिन में सब ठीक हो जाएगा।
उस देवदूत को ले कर चमार घर लौटा। न तो चमार को पता है कि देवदूत घर में आ रहा है, न पत्नी को पता है। जैसे ही देवदूत को ले कर चमार घर में पहुंचा, पत्नी एकदम पागल हो गयी। बहुत नाराज हुई, बहुत चीखी- चिल्लायी। और देवदूत पहली दफा हंसा। चमार ने उससे कहा, हंसते हो, बात क्या है? उसने कहा, मैं जब तीन बार हंस लूंगा तब बता दूंगा।
देवदूत हंसा पहली बार, क्योंकि उसने देखा कि इस पत्नी को पता ही नहीं है कि चमार देवदूत को घर में ले आया है, जिसके आते ही घर में हजारों खुशियां आ जाएंगी। लेकिन आदमी देख ही कितनी दूर तक सकता है! पत्नी तो इतना ही देख पा रही है कि एक कंबल और बच्चों के पकड़े नहीं बचे। जो खो गया है वह देख पा रही है, जो मिला है उसका उसे अंदाज ही नहीं है–मुफ्त! घर में देवदूत आ गया है। जिसके आते ही हजारों खुशियों कश्रो,नंंक्या घट रहा है!
जल्दी ही, क्योंकि वह देवदूत था, सात दिन में ही उसने चमार का सब काम सीख लिया। और उसके जूते इतने प्रसिद्ध हो गए कि चमार महीनों के भीतर धनी होने लगा। आधा साल होते-होते तो उसकी ख्याति सारे लोक में पहुंच गयी कि उस जैसा जूते बनाने वाला कोई भी नहीं, क्योंकि वह जूते देवदूत बनाता था। सम्राटों के जूते वहां बनने लगे। धन अपरंपार बरसने लगा। एक दिन सम्राट का आदमी आया। और उसने कहा कि यह चमड़ा बहुत कीमती है, आसानी से मिलता नहीं, कोई भूल-चूक नहीं करना। जूते ठीक इस तरह के बनने हैं। और ध्यान रखना जूते बनाने हैं, स्लीपर नहीं। क्योंकि रूस में जब कोई आदमी मर जाता है तब उसको स्लीपर पहना कर मरघट तक ले जाते हैं। चमार ने भी देवदूत को कहा कि स्लीपर मत बना देना। जूते बनाने हैं, स्पष्ट आज्ञा है, और चमड़ा इतना ही है। अगर गड़बड़ हो गयी तो हम मुसीबत में फंसेंगे।
लेकिन फिर भी देवदूत ने स्लीपर ही बनाए।
जब चमार ने देखे कि स्लीपर बने हैं तो वह क्रोध से आगबबूला हो गया। वह लकड़ी उठा कर उसको मारने को तैयार हो गया कि तू हमारी फांसी लगवा देगा! और तुझे बार-बार कहा था कि स्लीपर बनाने ही नहीं हैं, फिर स्लीपर किसलिए? देवदूत फिर खिलखिला कर हंसा।
तभी आदमी सम्राट के घर से भागा हुआ आया। उसने कहा, जूते मत बनाना, स्लीपर बनाना। क्योंकि सम्राट की मृत्यु हो गयी है।
भविष्य अज्ञात है। सिवाय उसके और किसी को ज्ञात नहीं। और आदमी तो अतीत के आधार पर निर्णय लेता है। सम्राट जिंदा था तो जूते चाहिए थे, मर गया तो स्लीपर पर चाहिए।
तब वह चमार उसके पैर पकड़ कर माफी मांगने लगा कि मुझे माफ कर दे, मैंने तुझे मारा। पर उसने कहा, कोई हर्ज नहीं। मैं अपना दंड भोग रहा हूं। लेकिन वह हंसा आज दुबारा। चमार ने फिर पूछा कि हंसी का कारण? उसने कहा कि जब मैं तीन बार हंस लूं…।
दुबारा हंसा इसलिए कि भविष्य हमें ज्ञात नहीं है। इसलिए हम आकांक्षाएं करते हैं जो कि व्यर्थ हैं। हम अभीप्साएं करते हैं जो कभी पूरी न होंगी। हम मांगते हैं जो कभी नहीं घटेगा। क्योंकि कुछ और ही घटना तय है। हमसे बिना पूछे हमारी नियति घूम रही है। और हम व्यर्थ ही बीच में शोरगुल मचाते हैं। चाहिए स्लीपर और हम जूते बनवाते हैं। मरने का वक्त करीब आ रहा है और जिंदगी का हम आयोजन करते हैं। तो देवदूत को लगा कि वे बच्चियां! मुझे क्या पता, भविष्य उनका क्या होने वाला है? मैं नाहक बीच में आया।
और तीसरी घटना घटी कि एक दिन तीन लड़कियां आयीं जवान। उन तीनों की शादी हो रही थी। और उन तीनों ने जूतों के आर्डर दिए कि उनके लिए जूते बनाए जाएं। एक बूढ़ी महिला उनके साथ आयी थी जो बड़ी धनी थी। देवदूत पहचान गया, ये वे ही तीन लड़कियां हैं, जिनको वह मृत मां के पास छोड़ गया था और जिनकी वजह से वह दंड भोग रहा है। वे सब स्वस्थ हैं, सुंदर हैं। उसने पूछा कि क्या हुआ? यह बूढ़ी औरत कौन है? उस बूढ़ी औरत ने कहा कि ये मेरी पड़ोसिन की लड़कियां हैं। गरीब औरत थी, उसके शरीर में दूध भी न था। उसके पास पैसे-लत्ते भी नहीं थे। और तीन बच्चे जुड़वां। वह इन्हीं को दूध पिलाते-पिलाते मर गयी। लेकिन मुझे दया आ गयी, मेरे कोई बच्चे नहीं हैं, और मैंने इन तीनों बच्चियों को
पाल लिया।

अगर मां जिंदा रहती तो ये तीनों बच्चियां गरीबी, भूख और दीनता और दरिद्रता में बड़ी होतीं। मां मर गयी, इसलिए ये बच्चियां तीनों बहुत बड़े धन-वैभव में, संपदा में पलीं। और अब उस बूढ़ी की सारी संपदा की ये ही तीन मालिक हैं। और इनका सम्राट के परिवार में विवाह हो
रहा है।

देवदूत तीसरी बार हंसा। और चमार को उसने कहा कि ये तीन कारण हैं। भूल मेरी थी। नियति बड़ी है। और हम उतना ही देख पाते हैं, जितना देख पाते हैं। जो नहीं देख पाते, बहुत विस्तार है उसका। और हम जो देख पाते हैं उससे हम कोई अंदाज नहीं लगा सकते, जो होने वाला है, जो होगा। मैं अपनी मूर्खता पर तीन बार हंस लिया हूं। अब मेरा दंड पूरा हो गया और अब मैं जाता हूं।
तुम अगर अपने को बीच में लाना बंद कर दो, तो तुम्हें मार्गों का मार्ग मिल गया। फिर असंख्य मार्गों की चिंता न करनी पड़ेगी।
छोड़ दो उस पर। वह जो करवा रहा है, जो उसने अब तक करवाया है, उसके लिए धन्यवाद। जो अभी करवा रहा है, उसके लिए धन्यवाद। जो वह कल करवाएगा, उसके लिए धन्यवाद। तुम बिना लिखा चेक धन्यवाद का उसे दे दो। वह जो भी हो, तुम्हारे धन्यवाद में कोई फर्क न पड़ेगा। अच्छा लगे, बुरा लगे, लोग भला कहें, बुरा कहें, लोगों को दिखायी पड़े दुर्भाग्य या सौभाग्य, यह सब चिंता तुम मत करना।
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By Unknown at November 28, 2018 No comments:
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Sahej Yog | सहज योग

Unknown
Sahej Yog | सहज योग
साधना के सोपान में तीन चरण होते हैं विद्वता,सिद्धता,सरलता, विद्वान होना सरल है सिद्धियाँ भी मिल जाएंगी थोड़े बहुत परिश्रम से परन्तु सरलता अभ्यास से न आएगी,एक कथा है एक लड़का था घर में पड़ा रहता था खाना खाया और सोये रहना उसका काम,घर वालों ने घर से निकाल दिया काम न करने की वजह से, निकल गया मंदिर के बाहर देखा पुजारी जी बहुत मोटे तगड़े और उनके शिष्य भी वैसी ही सेहत के मालिक सोचा काफी खाने को मिलता होगा चल पड़ा पुजारी जी की शरण में कहा कि मुझे भी शिष्य बना लीजिये, पुजारी जी ने बना लिया शिष्य कहा दो टाइम दिन में पंगत रहती है खूब खाओ पियो और तुलसी की माला पहना दी बाकि टाइम भजन करो, लड़के ने कहा कि पंगत में 4 बार खाना खा सकते है ?, उसकी भी मंजूरी हो गयी, मज़े आ गए खाना पीना और मस्त रहना , आखिर दुःख की घड़ी भी आनी थी एकादसी का दिन वैष्णवों का व्रत का दिन, भोजनालय में चूल्हे ठंडे , कोई हलचल नहीँ, लड़का परेशान पहुंचा गुरु जी के पास पुछा भोजन के बारे में , जबाब की आज तो कुछ न मिलेगा न बनेगा, कहने लगा गुरु जी हम न रह पाएंगे कुछ कीजिए|



गुरु जी ने दया दिखाई और कहा अनाज ले लो भण्डार से 2 सेर आटा इत्यादि दे दिया कहा नदी किनारे जाओ वहीं बना लेना और प्रभु को भोग लगा कर ही खाना बाकि प्रसाद रूप में,लो जी काम बन गया चला गया भजन बनाया वहां और लगा भगवान को बुलाने, राजा राम आइये मेरे भोजन को भोग लगाइये, कोई नहीं आया परेशान हो गया गुरु की आज्ञा थी भोग लगा कर ही खाना, फिर याद आया की भगवान शायद मंदिर के 56 भोग का इंतज़ार कर रहे होंगे , हँसा भगवान को पुकार कर कहने लगा 56 भोग तो क्या आज मंदिर में जैसा मैंने बनाया है वैसा भी न मिलेगा , मैं भी वहीं से भाग कर आया हूँ, चुपचाप जैसा मिल रहा है खा लो मंदिर के चक्कर में भूखा ही सोना पड़ेगा, इसी भाव से भगवान रीझ गये और प्रकट हुए जानकी सीता सहित राम जी, भक्त ने जब दो जनो को देखा तो और परेशान हो गया कि भोजन तो 2 जनो के लिये ही बनाया था और दो ये आ गए बुलाया एक को था ,चलो कोई बात नहीं मिल कर खा लेंगे कम ही मिले मिलेगा तो, और भगवान को कहने लगा , अगली एकादशी को जल्दी आ जाना, हो गया अगली एकादशी को गुरु जी से कहने लगा वहां दो भगवान आते हैं अनाज कम ही गया था, गुरु जी हंसने लगे की कम पड़ गया होगा इसे अनाज तो बहाने लगा रहा है,कोई बात नहीं 1 सेर और ले जाओ, लो जी खाना बनाया प्रभु को भोग लगाने की गुहार लगाई,सीता राम आइये मेरे भोजन को भोग लगाइये प्रभु प्रकट हुए परन्तु अबकी बार राम ,लखन सीता, जी तीनो साथ ही आये और परेशान हो गया एक बुलाया दो आये दो बुलाया तीन आगये हद हो गयी लगा कहने प्रभु को की ऐसा अच्छा नहीं है चलो कोई बात नहीं एडजस्ट कर लेंगे परंतु बार बार ऐसा नहीं चलेगा , पिछली एकादसी कम में गुजारा किया अब भी वैसा ही, चलो गुजारा कर ही लिया अगली एकादशी को गुरु जी को कहने लगा वहाँ तीन तीन भगवान हो जाते हैं अनाज थोड़ा बड़ा दीजिए, गुरु जी सोचने लगे की अन्न कहि बेच तो नही रहा देखते हैं, उसकी जरूरत के अनुसार अनाज भंडार से दे दिया, आज भक्त ने भी अनाज बनाया नहीं पकाया नहीं वैसे ही रख दिया की जितने आएंगे वैसे ही उस हिसाब से पक लूँगा, बुलाया भगवान को राम आइये सीता लखन को भी साथ बुलाइये मेरे भोजन को भोग लगाइये, भगवान हुए प्रकट पुरे राम दरबार सहित, राम , लखन, सीता, भरत, शत्रुघ्न जी और साथ में हनुमान जी, हे भगवान तीन बुलाये और सारे रिस्तेदार साथ ले आये खुद तो आये ही हनुमान जी की तरफ देखते हुए कहता है वानर भी साथ ले आएं है आज तो कुछ न मिलेगा भोजन में , कहने लगा भगवान को की आज अनाज ही है खुद इन लोगों से पक्वाओ और खाओ, भगवान जी मुस्कुराने लगे की आज भगत की ही चलेगी, भरत जानकी लक्ष्मण जी हनुमान जी रसोई बनाने को लग गए ऐसा दृश्य देखकर समस्त सिद्ध देवता वहां भगवान की लीला देखने को प्रकट हो गए,और खुद वो भक्त पेड़ के नीचे जाकर आँखे बंद करके सोचने लगा की आज इतने लोग आ गए हैं कुछ न मिलेगा, इतने में गुरु जी आगये पेड़ के नीचे चेले को आँखे बन किये हुए देखा पास पड़े अनाज को भी, पुछा क्या हो रहा है ऐसे क्यों बैठे हो, शिष्य कहने लगा भगवान आये हैं अपने साथी भगवानों के साथऔर खाना बनाने लगे हैं, गुरु जी को कुछ न दिखे उन्होंने कहा खान हैं भगवान ,शिष्य सोचने लगा की एक तो कुछ खाने को न मिलेगा ऊपर से गुरु जी को भी न दिख रहे भगवान अगली एकादशी को कुछ अनाज भी न मिलेगा, उसने भगवान को कहा कि गुरु जी को क्यों नहीं दिख रहे हो आप वो सिद्ध हैं विद्वान् है, भगवान ने मुस्कुरा कर कहा कोई संशय नहीं की गुरु आपके सिद्ध और विद्वान् है परंतु उनमें सरलता नहीं, उसने गुरु जी को कहा कि भगवान कहते है कि आपमें सरलता नहीं इसलिये आपको नहिं दिख रहे,गुरु जी भाव विह्ल होकर रोने लगे वैरागी हो गए तत्क्षण भगवान गुरु जी के सामने प्रकट हुए और शिष्य के साथ गुरु भी धन्य हुए, जीना सरल है, जीतना सरल है हारना भी सरल है, प्रेम करना भी सरल है कठिन है सरल होना ,साधना से,तप से विद्वता,सिद्धता तो मिल ही जायेगी सरलता मिलेगी,समर्पण से अस्तित्व के प्रति पूर्ण समर्पण ही सरलता है,।
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By Unknown at November 28, 2018 No comments:
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मंत्र चिकित्सा | Mantra Healing

Unknown
मंत्र चिकित्सा | Mantra Healing

मंत्रविद्या असम्भव को सम्भव बनाती हैं :-

ग्रह और बीमारियाँ और मंत्र चिकित्सा से लाभ—

ग्रह जब भ्रमण करते हुए संवेदनशील राशियों के अंगों से होकर गुजरता है तो वह उनको नुकसान पहुंचाता है। नकारात्मक ग्रहों के प्रभाव को ध्यान में रखकर आप अपने भविष्य को सुखद बना सकते हैं।
वैदिक वाक्य है कि पिछले जन्म में किया हुआ पाप इस जन्म में रोग के रूप में सामने आता है। शास्त्रों में बताया है-पूर्व जन्मकृतं पापं व्याधिरूपेण जायते अत: पाप जितना कम करेंगे, रोग उतने ही कम होंगे। अग्नि, पृथ्वी, जल, आकाश और वायु इन्हीं पांच तत्वों से यह नश्वर शरीर निर्मित हुआ है। यही पांच तत्व 360 की राशियों का समूह है।


इन्हीं में मेष, सिंह और धनु अग्नि तत्व, वृष, कन्या और मकर पृथ्वी तत्व, मिथुन, तुला और कुंभ वायु तत्व तथा कर्क, वृश्चिक और मीन जल तत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं। कालपुरुष की कुंडली में मेष का स्थान मस्तक, वृष का मुख, मिथुन का कंधे और छाती तथा कर्क का हृदय पर निवास है जबकि सिंह का उदर (पेट), कन्या का कमर, तुला का पेडू और वृश्चिक राशि का निवास लिंग प्रदेश है। धनु राशि तथा मीन का पगतल और अंगुलियों पर वास है।


इन्हीं बारह राशियों को बारह भाव के नाम से जाना जाता है। इन भावों के द्वारा क्रमश: शरीर, धन, भाई, माता, पुत्र, ऋण-रोग, पत्नी, आयु, धर्म, कर्म, आय और व्यय का चक्र मानव के जीवन में चलता रहता है। इसमें जो राशि शरीर के जिस अंग का प्रतिनिधित्व करती है, उसी राशि में बैठे ग्रहों के प्रभाव के अनुसार रोग की उत्पत्ति होती है। कुंडली में बैठे ग्रहों के अनुसार किसी भी जातक के रोग के बारे में जानकारी हासिल कर सकते हैं।
कोई भी ग्रह जब भ्रमण करते हुए संवेदनशील राशियों के अंगों से होकर गुजरता है तो वह उन अंगों को नुकसान पहुंचाता है। जैसे आज कल सिंह राशि में शनि और मंगल चल रहे हैं तो मीन लग्न मकर और कन्या लग्न में पैदा लोगों के लिए यह समय स्वास्थ्य की दृष्टि से अच्छा नहीं कहा जा सकता।


अब सिंह राशि कालपुरुष की कुंडली में हृदय, पेट (उदर) के क्षेत्र पर वास करती है तो इन लग्नों में पैदा लोगों को हृदयघात और पेट से संबंधित बीमारियों का खतरा बना रहेगा। इसी प्रकार कुंडली में यदि सूर्य के साथ पापग्रह शनि या राहु आदि बैठे हों तो जातक में विटामिन ए की कमी रहती है। साथ ही विटामिन सी की कमी रहती है जिससे आंखें और हड्डियों की बीमारी का भय रहता है।


चंद्र और शुक्र के साथ जब भी पाप ग्रहों का संबंध होगा तो जलीय रोग जैसे शुगर, मूत्र विकार और स्नायुमंडल जनित बीमारियां होती है। मंगल शरीर में रक्त का स्वामी है। यदि ये नीच राशिगत, शनि और अन्य पाप ग्रहों से ग्रसित हैं तो व्यक्ति को रक्तविकार और कैंसर जैसी बीमारियां होती हैं। यदि इनके साथ चंद्रमा भी हो जाए तो महिलाओं को माहवारी की समस्या रहती है जबकि बुध का कुंडली में अशुभ प्रभाव चर्मरोग देता है।
चंद्रमा का पापयुक्त होना और शुक्र का संबंध व्यसनी एवं गुप्त रोगी बनाता है। शनि का संबंध हो तो नशाखोरी की लत पड़ती है। इसलिए कुंडली में बैठे ग्रहों का विवेचन करके आप अपने शरीर को निरोगी रख सकते हैं। किंतु इसके लिए सच्चरित्रता आवश्यक है। आरंभ से ही नकारात्मक ग्रहों के प्रभाव को ध्यान में रखकर आप अपने भविष्य को सुखद बना सकते हैं।


मंत्र चिकित्सा के लाभ—


मंत्र से विविध शारीरिक एवं मानसिक रोगों में लाभ मिलता है। यह बात अब विशेषज्ञ भी मानने लगे हैं कि मनुष्य के शरीर के साथ-साथ यह समग्र सृष्टि ही वैदिक स्पंदनों से निर्मित है। शरीर में जब भी वायु-पित्त-कफ नामक त्रिदोषों में विषमता से विकार पैदा होता है तो मंत्र चिकित्सा द्वारा उसका सफलता पूर्वक उपचार किया जाना संभव है।


अमेरिका के ओहियो यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं के अनुसार कैंसरयुक्त फेफड़ों, आंत, मस्तिष्क, स्तन, त्वचा और फाइब्रो ब्लास्ट की लाइनिंग्स पर जब सामवेद के मंत्रों और हनुमान चालीसा के पाठ का प्रभाव परखा गया तो कैंसर की कोशिकाओं की वृद्धि में भारी गिरावट आई। इसके विपरीत तेज गति वाले पाश्चात्य और तेज ध्वनि वाले रॉक संगीत से कैंसर की कोशिकाओं में तेजी के साथ बढ़ोतरी हुई।मंत्र चिकित्सा के लगभग पचास रोगों के पांच हजार मरीजों पर किए गए क्लीनिकल परीक्षणों के अनुसार दमा, अस्थमा रोग में सत्तर प्रतिशत, स्त्री रोगों में 65 प्रतिशत, त्वचा एवं चिंता संबंधी रोगों में साठ प्रतिशत, उच्च रक्तदाब, हाइपरटेंशन से पीड़ितों में पचप प्रतिशत, आर्थराइटिस में इक्यावन प्रतिशत, डिस्क संबंधी समस्याओं में इकतालीस प्रतिशत, आंखों के रोगों में इकतालीस प्रतिशत तथा एलर्जी की विविध अवस्थाओं में चालीस प्रतिशत औसत लाभ हुआ। निश्चित ही मंत्र चिकित्सा उन लोगों के लिए तो वरदान ही है जो पुराने और जीर्ण क्रॉनिक रोगों से ग्रस्त हैं।


कहा गया है कि जब भी कोई व्यक्ति गायत्री मंत्र का पाठ करता है तो अनेक प्रकार की संवेदनाएं इस मंत्र से होती हुई व्यक्ति के मस्तिष्क को प्रभावित करती हैं। जर्मन वैज्ञानिक कहते हैं कि जब भी कोई व्यक्ति अपने मुंह से कुछ बोलता है तो उसके बोलने में आवाज का जो स्पंदन और कंपन होता है, वह 175 प्रकार का होता है। जब कोई कोयल पंचम स्वर में गाती है तो उसकी आवाज में 500 प्रकार का प्रकंपन होता है लेकिन जर्मन वैज्ञानिक यह भी कहते हैं कि दक्षिण भारत के विद्वानों से जब विधिपूर्वक गायत्री मंत्र का पाठ कराया गया, तो यंत्रों के माध्यम से यह ज्ञात हुआ कि गायत्री मंत्र का पाठ करने से संपूर्ण स्पंदन के जो अनुभव हुए, वे 700 प्रकार के थे।
जर्मन वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर कोई व्यक्ति पाठ नहीं भी करे, सिर्फ पाठ सुन भी ले तो भी उसके शरीर पर इसका प्रभाव पड़ता है। उन्होंने मनुष्य की आकृति का छोटा सा यंत्र बनाया और उस आकृति में जगह-जगह कुछ छोटी-छोटी लाइटें लगा दी गईं। लाइट लगाने के बाद यंत्र के आगे लिख दिया कि यहां पर खड़ा होकर कोई आदमी किसी भी तरह की आवाजें निकालें तो उस आवाज के हिसाब से लाइटें मनुष्य की आकृति में जलती नजर आएंगी, लेकिन अगर किसी ने जाकर गायत्री मंत्र बोल दिया तो पांव से लेकर सिर तक सारी की सारी लाइटें एक साथ जलने लग जाती है। दुनियाभर के मंत्र और किसी भी प्रकार की आवाजें निकालने से यह सारी की सारी लाइटें नहीं जलतीं। एक गायत्री मंत्र बोलने से सब जलने लग जाती हैं क्योंकि इसके अंदर जो वाइब्रेशन है, वह अद्भुत है।

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